सुभाष चंद्र बोस ने बनवाई थीं किसकी तस्वीरें, क्या था हरिपुरा पोस्टर्स का गांधी कनेक्शन?

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नई दिल्ली। नंदलाल बोस ने कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन, गुजरात के लिए लगभग 400 पेंटिंग बनाई थीं। अस्वथी गोपीनाथ बता रही हैं कि आमतौर पर हरिपुरा पोस्टर्स के नाम से पहचाने जाने वाले इन चित्रों में रोजमर्रा के काम में लगी स्थानीय आबादी को दर्शाया गया था, जिसके लिए बोस ने देश की कई कला परंपराओं को एक साथ मिलाया था।

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फरवरी, 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 51वां अधिवेशन सूरत, गुजरात के हरिपुरा गांव में रखा गया था। सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में हुई सभा में दो लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया था। सभा में अन्य कई चीजों के साथ-साथ भारत के भीतर पूर्ण स्वराज के बारे में चर्चा हुई, किसान सभाओं के स्वयं को यूनियनों के भीतर संगठित करने के अधिकारों पर विचार किया गया और रियासतों की चिंताओं का समाधान किया गया। ये चर्चाएं ब्रिटिश राज के खिलाफ बढ़ते विरोध के संदर्भ में की गईं थीं। खास तौर से नंदलाल बोस के बनाए चित्रों के संदर्भ में।

आम जीवन के करीब चित्र

इन चित्रों का खाका महात्मा गांधी ने खीचा था, जिन्हें नंदलाल बोस ने कैनवास पर उकेरा था, जिन्हें आम तौर पर हरिपुरा पोस्टर्स के नाम से पहचाना जाता था। वॉटर कलर से बने इन चित्रों में रोजमर्रा के काम में लगी स्थानीय आबादी को दर्शाया गया था। अधिवेशन में भाग लेने वाले नागरिकों के लिए एक सुपाठ्य दृश्य कोश पेश करने की गांधी की इच्छा और बोस की अपनी कलात्मक अभिरुचि के मेलजोल से इन चित्रों का विषय चुना गया था। इस तरह बोस ने हरिपुरा अधिवेशन के लिए लगभग 400 पेंटिंग बनाईं। चित्र बनाने से पहले बोस ने हरिपुरा के पास विट्ठलनगर नामक गांव में स्थानीय लोगों को देखते हुए कई सप्ताह बिताए और प्रारंभिक रेखाचित्र तैयार किए। इन पोस्टर्स में गांव के लोगों को अपनी पेशेवर, घरेलू और व्यक्तिगत गतिविधियों में व्यस्त दिखाया गया है, जैसे कि बच्चे को नहलाती मां, सारंगी जैसे वाद्ययंत्र बजाते कुछ लोग, जमीन जोतते किसान और अपने औजारों पर काम करते बढ़ई एवं कुम्हार। लोगों की छवियों के साथ-साथ बोस ने स्थानीय पौधों और जानवरों, बर्तन और लैंप जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं को भी चित्रित किया था।

आदर्श छवियों के चित्रकार

नंदलाल बोस हरिपुरा अधिवेशन के पंडालों को सजाने के लिए उपयुक्त चित्रकार थे। उन्हें भारत के भीतर कई कलात्मक रीति-रिवाजों के तत्वों को शामिल करने वाली दृश्य शैली के लिए जाना जाता था। इनमें स्थानीय कला और लघु चित्रकला परंपराओं के साथ-साथ जापानी इंक वॉश पेंटिंग के तत्वों को भी अपनाया गया था। वह अपने पूरे कलात्मक करियर के दौरान अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक चिंताओं के प्रति संवेदनशील रहे और अपने काम में राष्ट्रवादी और सामाजिक विषय भी शामिल किए। स्वतंत्रता संग्राम के साथ पूर्व जुड़ाव और भागीदारी के चलते उन्होंने गांधी की छड़ी के साथ वाली वह लिनोकट छवि बनाई, जो हमें आज हर जगह दिखाई देती है और जिसको इस तरह की छवियों का आदर्श माना जाता है। यह छवि सुभाष चंद्र बोस ने दांडी मार्च की स्मृति में कमीशन की थी।

गति दिखाती कोमल रेखाएं

हरिपुरा पोस्टर्स को हल्के रंगों के साथ बनाया गया है। उनमें मानव आकृतियों को अतिशयोक्तिपूर्ण विशेषताओं और कोमल रेखाओं के साथ चित्रित किया गया है, जो गति की तरलता को दर्शाता है। भूरे, स्लेटी और गेरुए रंग के प्रभुत्व वाली पृष्ठभूमि में परिदृश्य को मुख्य रूप से मोटे स्ट्रोक और रेखाओं के माध्यम से दर्शाया गया है। पोस्टर्स के विषयों को नुकीले मेहराबों में फ्रेम किया गया है, जो उन्हें केंद्र में लाते हैं-मानो चित्र रोजमर्रा की जिंदगी पर रोशनी डालकर उसका उत्सव मना रहे हों। हरिपुरा पोस्टर्स के चित्र बंगाल स्कूल की पसंदीदा शैलियों को प्रदर्शित करते हैं, साथ ही लोक कला के प्रभाव को भी दिखाते हैं, खासकर उड़ीसा और बंगाल के पट्टचित्रों के प्रभाव को। इन चित्रों को बनाने में नंदलाल बोस ने देश की कई कला परंपराओं को एक साथ मिलाया और इस तरह ऐसे अधिवेशन के लिए सार्थक पृष्ठभूमि तैयार की, जो एकीकृत स्वतंत्र भारत के ऊपर केंद्रित थी।

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