एक्सपर्ट से जानें अबॉर्शन का फर्टिलिटी पर असर और इसके कितने दिनों बाद दोबारा कर सकते हैं फैमिली प्लॉनिंग

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गर्भपात कराने का फैसला महिलाओं के लिए काफी मुश्किल भरा होता है। इस प्रोसेस को करने से लेकर उसके बाद भी काफी समय तक उन्हें कई तरह की शारीरिक व मानसिक दिक्कतों से गुजरना पड़ता है। मजबूरी या मर्जी से लिए गए इस डिसीजन को लेकर महिलाओं के मन में कई तरह के सवाल होते हैं, जिसमें से एक है कि क्या इसका प्रजनन क्षमता पर कोई असर पड़ता है? साथ ही कई तरह की गलतफहमियां भी फैली हुई हैं, तो आज के लेख में हम इन्हीं सब चीज़ों के बारे में जानने वाले हैं। 

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डॉ. संदीप तलवार, फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट, नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी, वंसत विहार बताते हैं कि, गर्भपात का प्रजनन क्षमता पर काफी कम प्रभाव पड़ता है और इसके बाद भी आप आसानी से गर्भधारण कर सकती हैं और सुरक्षित ढंग से बच्चे को जन्म दे सकती हैं। गर्भपात के बाद महिलाओं को कई जटिल और गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। खैर यह गर्भपात के तरीके पर भी निर्भर करता है, जिसे वह अपनाते हैं। गर्भपात के दो मुख्य तरीके हैं, मेडिकल और सर्जिकल।

मेडिकल अबॉर्शन आमतौर पर पहली तिमाही के दौरान किया जाता है। इसके लिए दवाइयों का इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी तरफ सर्जिकल अबॉर्शन है, जिसे डाइलेशन और क्यूरेटेज (डी एंड सी) भी कहा जाता है। इस तरीके में सक्शन और क्यूरेट नाम के उपकरण से भ्रूण को निकाला जाता है। 

मेडिकल अबॉर्शन की तुलना में सर्जिकल अबॉर्शन में कई तरह की जटिलताएं होने की आशंका बहुत ज्यादा होती है। जिसमें गर्भाशय में संक्रमण, गर्भाशय ग्रीवा का फटना या घाव, एशरमैन सिंड्रोम, खून बहना, गर्भाशय में टिश्यू का बरकरार रहना जैसे और भी कॉम्प्लीकेशन शामिल हैं।’ 

ब्रैंडा एल श्‍लोटेन और गोडोलीव सी.एम.एल. पेज क्रिस्टिएंस के अध्ययन के अनुसार अबॉर्शन के लिए सर्जरी और प्रेग्नेंसी के खतरों के बीच कनेक्शन है। प्रीमैच्योर डिलीवरी, गर्भाशय ग्रीवा में पर्याप्त जगह का न होना, प्लेसेंटल का बरकरार रहना और प्रसव के बाद खून बहने जैसी बहुत सारी समस्याएं हैं, जो गर्भपात के लिए सर्जरी कराने से हो सकती है। ध्यान दें कि गर्भपात सबसे ज्यादा सुरक्षित गर्भावस्था के पहले महीनों में होता है। 

प्रजजन क्षमता पर गर्भपात का प्रभाव

कई रिसर्च में यह सुझाव दिया गया है कि गर्भपात का आमतौर पर प्रजनन क्षमता पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। मेडिकल तरीके से गर्भपात कराने या गर्भपात की सर्जरी कराने से जुड़े खतरे काफी कम हैं।  हालांकि, अगर अबॉर्शन की प्रक्रिया से गर्भाशय में संक्रमण हो जाता है तो इससे दोबारा कंसीव करने में दिक्कत हो सकती है। वैसे मेडिकल अबॉर्शन में इन्फेक्शन होने का खतरा बहुत कम रहता है। सर्जिकल प्रोसेस में इसकी संभावना ज्यादा होती है। 

गर्भपात के कितने वक्त बाद कर सकते हैं कंसीव?

ज्यादातर मामलों में, गर्भपात का प्रजनन क्षमता पर कोई प्रभावी असर नहीं होता। आमतौर पर अबॉर्शन के बाद मासिक धर्म शुरू हो जाता है, जिसमें 28 दिन के चक्र में अंडे 14वें दिन के आसपास बनते हैं। हालांकि, अलग-अलग व्यक्तियों में मासिक धर्म की लंबाई ज्यादा हो सकती है, जो अंडों के बनने के सटीक समय को प्रभावित करती है।

कई डॉक्टर्स गर्भपात के बाद गर्भधारण करने के लिए कम से कम एक पीरियड्स तक इंतजार करने की सलाह देते हैं, जिससे बॉडी को रिकवर होने का समय मिल सके और इन्फेक्शन का खतरा भी कम हो सके।

जो लोग अलग-अलग मेडिकल कारणों से पहले अपना अबॉर्शन करा चुके हों, उन्हें दूसरी बार गर्भधारण करने का प्रयास करने से पहले पूरे शरीर की मेडिकल जांच की सलाह दी जाती है। इस चेकअप से उन्हें कई परेशानियों का पहले ही पता चल जाएगा, जो भविष्य में गर्भावस्था के दौरान उनके शरीर में उभर सकती है। 

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Pic credit- freepik

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